पाँचों में पहला और सबसे महान — ज्योतिर्लिंग भी और चार धाम भी, जो केदारनाथ पर्वत-श्रृंखला के नीचे हिमनद से बनी विशाल घाटी में अकेला खड़ा है।
केदारप्रथम केदार
शिव का अंगपृष्ठ भाग (कूबड़)पृष्ठ भाग (कूबड़)
ऊँचाई3,583 मी11,755 फ़ीट
ट्रेक≈ 16 किमीगौरीकुंड से
कठिनाईमध्यम
ज़िलारुद्रप्रयागUttarakhand
शीतकालीन गद्दीओंकारेश्वर मंदिर, ऊखीमठ
यात्रा-काल 202622 अप्रैल 2026भाई दूज तक · लगभग 11 नवंबर 2026
केदारनाथ — त्वरित उत्तर
केदारनाथ कहाँ है?
उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग ज़िले में, गढ़वाल हिमालय में। यह पंच केदार का प्रथम केदार है।
केदारनाथ कितनी ऊँचाई पर है?
3,583 मी (11,755 फ़ीट).
यहाँ शिव के किस अंग की पूजा होती है?
पृष्ठ भाग (कूबड़) — बैल का कूबड़ — जिसकी पूजा शंकु जैसी, तिकोनी शिला के रूप में होती है।
पैदल मार्ग कितना लंबा है?
गौरीकुंड से एक ओर लगभग 16 किमी. चढ़ाई 6–9 घंटे · उतराई 5–6 घंटे. कठिनाई: मध्यम.
2026 में केदारनाथ कब खुला है?
कपाट खुलते हैं: 22 अप्रैल 2026. कपाट बंद: भाई दूज · लगभग 11 नवंबर 2026. शीतकालीन गद्दी: ओंकारेश्वर मंदिर, ऊखीमठ.
दर्शन का समय क्या है?
सुबह 4:00 बजे — महाभिषेक और प्रातः पूजा; सुबह 6:00 – दोपहर 3:00 बजे — सामान्य दर्शन (स्पर्श दर्शन केवल दोपहर 3 बजे से पहले); दोपहर 3:00 – शाम 5:00 बजे — भोग और विश्राम के लिए मंदिर बंद; शाम 5:00 – रात 9:00 बजे — दूर से शृंगार दर्शन; शाम 6:30 – 7:30 बजे — शयन / संध्या आरती.
केदारनाथ कैसे पहुँचें?
ऋषिकेश → देवप्रयाग → रुद्रप्रयाग → गुप्तकाशी → सोनप्रयाग (लगभग 210 किमी)। निजी वाहन सोनप्रयाग तक ही जाते हैं; आख़िरी 5 किमी गौरीकुंड तक शेयर जीप चलती हैं।
अंतिम जाँच 13 अक्टूबर 2026 · MushroomWale.com कार्यालय द्वारा तैयार · स्रोत “विस्तार” भाग में दिए गए हैं।
इतिहासइतिहास और महत्व
बैल का कूबड़ — जिसकी पूजा शंकु जैसी, तिकोनी शिला के रूप में होती है।
पांडवों से बचने के लिए जब शिव धरती में समा गए, तब उनके बैल रूप का कूबड़ केदारनाथ में ऊपर उभर आया। यहाँ का शिवलिंग सामान्य गोल आकार का नहीं, बल्कि एक बेडौल, तिकोनी शिला है — जिसे बैल की पीठ माना जाता है।
परंपरा के अनुसार भूरे पत्थर का आज का मंदिर 8वीं सदी ईस्वी में आदि शंकराचार्य ने बनवाया, उसी जगह जहाँ कहा जाता है कि पांडवों ने मंदिर बनाया था। उनकी समाधि मंदिर के ठीक पीछे है। रावल (मुख्य पुजारी) कर्नाटक की वीरशैव जंगम परंपरा से आते हैं, और पूजा उनके नियुक्त किए पुजारी करते हैं।
2013 की आपदा में एक बड़ी शिला मंदिर के पीछे आकर टिक गई और मलबे के बहाव को दोनों ओर बाँट दिया। श्रद्धालु अब इसे भीम शिला के रूप में पूजते हैं।
महत्वपूर्ण बातें
12 ज्योतिर्लिंगों में से एक और उत्तराखंड के चार धाम में से एक
ज्योतिर्लिंगों में सबसे ऊँचा, 3,583 मी पर
मंदिर के पीछे शंकराचार्य समाधि और भीम शिला
ऊपर की धार पर भैरवनाथ मंदिर — क्षेत्रपाल (रक्षक देवता)
फाटा, सेरसी और गुप्तकाशी से हेलीकॉप्टर सेवा (बुकिंग केवल IRCTC हेलीयात्रा से)
विस्तारविस्तार से
केदारनाथ, पूरे विवरण के साथ
मंदिर का भवन और उसकी पूजा-पद्धति, उत्सव, पड़ाव-दर-पड़ाव मार्ग, महीने-दर-महीने मौसम, रास्ते की सुविधाएँ और जानने योग्य परंपराएँ।
केदारनाथ पत्थर का मंदिर है, जो उत्तर भारतीय नागर शैली के हिमालयी रूप में बना है — इसे अक्सर कत्यूरी शैली कहा जाता है। यह ऊँचे आयताकार चबूतरे पर बड़ी, बराबर कटी भूरी शिलाओं से बना है। बताया जाता है कि इन शिलाओं को गारे से नहीं, लोहे के कुंदों (क्लैंप) से जोड़ा गया है।
इसकी बनावट सीधी-सादी है। गर्भगृह में तीन कोनों वाला शिला-लिंग है। उसके सामने मंडप, यानी खंभों वाला सभा-मंडप है, जिसमें पाँचों पांडवों, कृष्ण, पार्वती और द्रौपदी की मूर्तियाँ हैं। द्वार के बाहर पत्थर के विशाल नंदी भगवान की ओर मुख किए बैठे हैं।
2022 में गर्भगृह की भीतरी दीवारों पर सोने की परत चढ़ी चादरें लगाई गईं। बाहर का पत्थर का ढाँचा वैसा ही है, जो सदियों की बर्फ़ और 2013 की बाढ़ झेलकर भी खड़ा है।
दिन की शुरुआत भोर से पहले महाभिषेक से होती है। सुबह शिवलिंग पर कोई शृंगार नहीं होता, और श्रद्धालु उसे छूकर घी का लेप कर सकते हैं। शाम को उसे फूलों और आभूषणों से सजाया जाता है — यह शृंगार दर्शन है, जो दूर से होता है। दिन का समापन शयन आरती से होता है।
रावल, यानी मुख्य पुजारी, कर्नाटक की वीरशैव जंगम परंपरा से आते हैं। रोज़ की पूजा वे आम तौर पर स्वयं नहीं करते; यह उनके नियुक्त जंगम पुजारी करते हैं। घाटी के वंशानुगत तीर्थ पुरोहित यात्री परिवारों की ओर से पूजा कराते हैं।
शालीन कपड़े पहनें। चमड़े का सामान, जूते और फ़ोन बाहर छोड़ें, और कतार संभालने वाले कर्मचारियों की बात मानें। विशेष पूजा की बुकिंग श्री बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति (BKTC) से ही कराएँ, दलालों से नहीं।
फ़रवरी–मार्च (महाशिवरात्रि)
कपाट खुलने की तिथि की घोषणा
महाशिवरात्रि पर ऊखीमठ के ओंकारेश्वर मंदिर में पुजारी पंचांग देखकर वह दिन और मुहूर्त घोषित करते हैं, जिस पर कपाट खुलेंगे।
अप्रैल–मई
डोली यात्रा और कपाट खुलना
सबसे पहले भैरवनाथ की पूजा होती है। फिर पंचमुखी डोली ऊखीमठ से निकलती है और कई दिनों में ऊपर पहुँचाई जाती है — आम तौर पर गुप्तकाशी, फाटा और गौरीकुंड में पड़ाव होते हैं। तय मुहूर्त पर भारी भीड़ के बीच कपाट खुलते हैं।
जुलाई–अगस्त (श्रावण पूर्णिमा)
श्रावणी अन्नकूट
BKTC इसे यात्रा-काल की विशेष अवसरों वाली पूजाओं में गिनती है। यह श्रावण की पूर्णिमा को होता है।
अक्टूबर–नवंबर (भाई दूज)
कपाट बंद होना
कपाट बंद होने की तिथि विजयादशमी पर घोषित होती है। भाई दूज की सुबह कपाट बंद किए जाते हैं और डोली सर्दियों के लिए ऊखीमठ की ओर उतरना शुरू करती है।
1
गौरीकुंड → जंगलचट्टी
≈ 4 किमी+400 मी
पक्का रास्ता गाँव से निकलकर मंदाकिनी की गहरी घाटी के ऊपर चढ़ता है। चढ़ाई एक जैसी है; चाय की दुकानें हैं और जंगल की कुछ छाँव भी।
2
जंगलचट्टी → भीमबली
≈ 2.5 किमी+270 मी
रास्ता घाटी के किनारे-किनारे ऊपर चलता रहता है। भीमबली में चिकित्सा चौकी, खाने की दुकानें और पीने का पानी है।
3
भीमबली → लिनचोली
≈ 5 किमी+530 मी
रामबाड़ा के पास मंदाकिनी पार करके 2013 के बाद बने नए मार्ग पर पहुँचते हैं। यह सबसे खड़ा और सबसे थकाने वाला हिस्सा है। लिनचोली में चिकित्सा चौकी, भोजन और हेलीपैड है।
4
लिनचोली → बेस कैंप
≈ 3 किमी+320 मी
पेड़ों की सीमा के ऊपर घाटी खुल जाती है। यहाँ बिल्कुल छाँव नहीं है; हवा तेज़ हो जाती है और दोपहर के बाद मौसम अक्सर बिगड़ता है।
5
बेस कैंप → केदारनाथ
≈ 1.5 किमी+80 मी
टेंटों की बस्ती के पास से लगभग समतल रास्ता मंदिर तक जाता है। भीड़ के मौसम में दर्शन की कतारें यहीं से लगती हैं।
-14°C15°C
जन≈ −12°C / ≈ −3°Cमंदिर बंद। गहरी बर्फ़।
फ़र≈ −11°C / ≈ −2°Cमंदिर बंद। गहरी बर्फ़।
मार्च≈ −8°C / ≈ 1°Cमंदिर बंद। बर्फ़; महीने के आख़िर में रास्ता साफ़ किया जाता है।
अप्रै≈ −4°C / ≈ 5°Cज़्यादातर सालों में अप्रैल के आख़िर में कपाट खुलते हैं। ऊपरी रास्ते पर बर्फ़ के ढेर।
मई≈ 0°C / ≈ 10°Cखुला। सुबहें साफ़; बहुत भीड़।
जून≈ 4°C / ≈ 13°Cखुला। जून के मध्य से मानसून से पहले की बौछारें।
जुला≈ 6°C / ≈ 13°Cखुला। मानसून — रोज़ बारिश, सड़कों पर भूस्खलन का ख़तरा।
अग≈ 6°C / ≈ 13°Cखुला। मानसून जारी।
सित≈ 3°C / ≈ 11°Cखुला। दूसरे पखवाड़े में बारिश थमती है; साफ़ नज़ारे लौट आते हैं।
अक्टू≈ −2°C / ≈ 8°Cखुला। ठंडा और साफ़ मौसम; रातें जमा देने वाली। महीने के आख़िर में हल्की बर्फ़ संभव।
नव≈ −6°C / ≈ 4°Cभाई दूज पर कपाट बंद। कड़ाके की ठंड।
दिस≈ −10°C / ≈ 0°Cमंदिर बंद। बर्फ़।
मंदिर की ऊँचाई पर अनुमानित तापमान (रात / दिन)। ये मौसम केंद्र के रिकॉर्ड नहीं हैं।
चिकित्सा सहायता
स्वास्थ्य विभाग पैदल मार्ग पर चिकित्सा राहत केंद्र चलाता है, जिनमें भीमबली और लिनचोली भी शामिल हैं; यात्रा-काल में वहाँ ऑक्सीजन और डॉक्टर रहते हैं। केदारनाथ में अस्पताल है। तबीयत ठीक न लगे तो किसी राहत केंद्र पर जाँच ज़रूर कराएँ।
मोबाइल नेटवर्क
Jio, BSNL और Airtel — तीनों के टावर मार्ग पर और केदारनाथ में हैं, पर कुछ जगहों पर सिग्नल चला जाता है और ख़राब मौसम में कमज़ोर रहता है। अलग-अलग कंपनियों के दो सिम काम आते हैं।
ATM और नकदी
पैदल मार्ग पर या केदारनाथ में ATM के भरोसे न रहें। गुप्तकाशी या किसी बड़े कस्बे से नकद निकाल लें। जहाँ सिग्नल हो, वहाँ UPI आम तौर पर चल जाता है।
रास्ते में भोजन
पूरे रास्ते भरपूर ढाबे और चाय की दुकानें हैं, और केदारनाथ में भी खाना मिलता है। केवल सादा शाकाहारी भोजन।
घोड़ा-खच्चर / पालकी / पिट्ठू
गौरीकुंड में घोड़े-खच्चर, पालकी, डंडी और पिट्ठू (टोकरी में बैठाकर ले जाने वाले कुली) मिलते हैं। इनका पंजीकरण और नियंत्रण ज़िला प्रशासन करता है और दरें तय हैं। केवल पंजीकृत सेवा लें और रसीद संभालकर रखें।
बिजली और चार्जिंग
केदारनाथ में बिजली है और ज़्यादातर ठहरने की जगहों पर फ़ोन चार्ज हो जाता है। ठंड में बैटरी जल्दी ख़त्म होती है, इसलिए पावर बैंक साथ रखें।
शौचालय
मार्ग पर थोड़ी-थोड़ी दूरी पर और केदारनाथ में सार्वजनिक शौचालय हैं। भीड़ के मौसम में कतार और सफ़ाई में कमी की उम्मीद रखें।
पीने का पानी
पैदल मार्ग पर और कस्बे में पीने के पानी के स्थान हैं। दोबारा भरी जा सकने वाली बोतल साथ रखें; प्लास्टिक से बचने को कहा जाता है।
करें
यात्रा पंजीकरण कराएँ और QR पर्ची व फ़ोटो पहचान पत्र साथ रखें।
ऊँचाई के अनुसार शरीर को ढलने देने के लिए चढ़ाई से पहले गुप्तकाशी या सीतापुर में एक रात रुकें।
परंपरा के अनुसार केदारनाथ के रक्षक भैरवनाथ के दर्शन करें।
विशेष पूजा की बुकिंग केवल BKTC के काउंटर या उसकी आधिकारिक वेबसाइट से करें।
दोपहर की शुरुआत तक उतरना शुरू कर दें, ताकि मौसम बिगड़ने से पहले ऊपरी रास्ते से नीचे आ जाएँ।
न करें
मंदिर परिसर में फ़ोन या कैमरा न ले जाएँ।
मंदिर के भीतर चमड़े का सामान न पहनें।
बिना पंजीकरण वाले घोड़े वालों या कुलियों को न लें।
जल्दी दर्शन का वादा करने वाले दलालों को पैसे न दें; ऐसी कोई आधिकारिक सेवा नहीं है।
रास्ते में प्लास्टिक न छोड़ें।
क्या केदारनाथ में शिवलिंग को छू सकते हैं?
आम तौर पर हाँ — सुबह के दर्शन में, जब शिवलिंग पर शृंगार नहीं होता और श्रद्धालु घी का लेप कर सकते हैं। शाम को शृंगार के बाद दर्शन केवल दूर से होते हैं। बहुत भीड़ वाले दिनों में मंदिर स्पर्श दर्शन सीमित कर सकता है।
केदारनाथ में पूजा कौन करता है?
कर्नाटक की वीरशैव परंपरा के जंगम पुजारी, मुख्य पुजारी रावल के अधीन। यात्री परिवारों की पूजा स्थानीय तीर्थ पुरोहित भी कराते हैं।
क्या केदारनाथ में अस्पताल है?
हाँ। केदारनाथ में अस्पताल है, और यात्रा-काल में पैदल मार्ग पर चिकित्सा राहत केंद्र भी होते हैं। गंभीर आपात स्थिति में 112 डायल करें।
क्या मंदिर में फ़ोन ले जा सकते हैं?
नहीं। BKTC मंदिर परिसर में फ़ोन, कैमरा या वीडियो बनाने की अनुमति नहीं देती। फ़ोन अपनी ठहरने की जगह पर या किसी साथी के पास छोड़ दें।
आधार: BKTC — श्री बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति (badrinath-kedarnath.gov.in) · उत्तराखंड पर्यटन (Uttarakhand Tourism) · रुद्रप्रयाग ज़िले की वेबसाइट · उत्तराखंड स्वास्थ्य विभाग की यात्रा सलाह (जैसा समाचारों में छपा) · BKTC के कपाट खुलने, बंद होने और फ़ोन संबंधी नियमों पर समाचार (2025–2026) · मिलान के लिए विकिपीडिया (केदारनाथ मंदिर)।
कथाएँकथाएँ
केदारनाथ की कथाएँ
पारंपरिक कथाएँ, जैसी पुराणों में और मंदिर समुदायों द्वारा सुनाई जाती हैं। हर घाटी में इनके रूप अलग-अलग मिलते हैं।
नर-नारायण ने शिव को हिमालय में बुलाया
पांडवों से बहुत पहले बदरिकाश्रम में दो ऋषि रहते थे — नर और नारायण, जिन्हें स्वयं विष्णु का रूप माना जाता है। वे हर दिन मिट्टी से शिवलिंग बनाते और उसमें शिव की पूजा करते — गर्मी हो या बर्फ़बारी।
उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर शिव उनके सामने प्रकट हुए और वर माँगने को कहा। ऋषियों ने अपने लिए कुछ नहीं माँगा। उन्होंने बस यही माँगा कि शिव सदा के लिए इसी स्थान पर विराजें, ताकि जो भी यहाँ आए, उसे उनके दर्शन मिलें। शिव ने यह स्वीकार किया और ऊँची घाटी में केदारेश्वर के रूप में विराजमान हो गए — बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक, यानी प्रकाश के स्तंभ।
बैल का कूबड़
जब भीम से बचने के लिए बैल रूप में शिव धरती में समाने लगे, तो उनका कूबड़ केदारनाथ में धरती के ऊपर ही रह गया। इसीलिए यहाँ का शिवलिंग ज़्यादातर शिव मंदिरों जैसा चिकना, गोल नहीं है। यह एक खुरदुरी, तिकोनी शिला है, जिसे बैल की पीठ माना जाता है।
श्रद्धालु आज भी इसे छूते हैं, इससे लिपटते हैं और इस पर घी का लेप करते हैं — मानो पकड़े गए भगवान की चोट खाई पीठ को सहला रहे हों।
आदि शंकराचार्य की अंतिम यात्रा
8वीं सदी में दार्शनिक आदि शंकराचार्य ने पैदल पूरे भारत की यात्रा की और पुराने तीर्थों को फिर से जीवित किया। परंपरा के अनुसार केदारनाथ का आज का भूरे पत्थर का मंदिर उन्होंने ही फिर से बनवाया। यह भी माना जाता है कि तभी से रावल, यानी मुख्य पुजारी, कर्नाटक के वीरशैव जंगम समुदाय से आते हैं।
कहा जाता है कि वे 32 वर्ष की आयु में केदारनाथ पहुँचे और वहीं समाधि ली। उनका समाधि स्थल मंदिर के ठीक पीछे है।
भैरवनाथ का पहरा
मंदिर के पूर्व में एक धार पर भैरवनाथ का मंदिर है — केदारनाथ के क्षेत्रपाल, यानी रक्षक। जब सर्दियों में कपाट बंद हो जाते हैं और घाटी बर्फ़ में दब जाती है, तब माना जाता है कि भैरव ही सूने मंदिर की रक्षा करते हैं।
इसलिए हर यात्रा-काल के अनुष्ठान उन्हीं से शुरू होते हैं और उन्हीं पर पूरे होते हैं। पहले उनकी पूजा होती है, और उनका पूजन हो जाने के बाद ही कपाट बंद किए जाते हैं।
वह शिला जिसने बाढ़ रोकी
16–17 जून 2013 की रात केदारनाथ के ऊपर एक हिमनदी झील फट गई। पानी और मलबे का सैलाब पूरे कस्बे को बहा ले गया और हज़ारों लोगों की जान चली गई।
बाढ़ के साथ एक विशाल शिला बहकर आई और मंदिर से कुछ ही मीटर पीछे आकर रुक गई। मलबा उसके दोनों ओर से बँटकर निकल गया और मंदिर लगभग सुरक्षित खड़ा रहा। श्रद्धालु अब इस शिला को भीम शिला के रूप में पूजते हैं — भीम की शिला, वह रक्षक जो बाढ़ के साथ आया।
ऊखीमठ की शीतकालीन यात्रा
भाई दूज के दिन केदारनाथ की चल विग्रह मूर्ति को सजी हुई पालकी, यानी डोली में विराजमान किया जाता है। ढोल-नगाड़ों और सेना के बैंड की धुन के बीच डोली कई दिनों में पहाड़ से नीचे लाई जाती है। सर्दियाँ वह ऊखीमठ के ओंकारेश्वर मंदिर में बिताती है, और गर्मियों में कपाट फिर खुलने तक केदारनाथ की पूजा वहीं होती है।
कहा जाता है कि ऊखीमठ का नाम असुर राजा बाणासुर की पुत्री उषा के नाम पर पड़ा। परंपरा के अनुसार यहीं उनका विवाह कृष्ण के पौत्र अनिरुद्ध से हुआ था, और उनकी विवाह वेदी आज भी मंदिर के भीतर दिखाई जाती है।
हर रास्ता OpenStreetMap की पगडंडियों से खींचा गया है, और उसकी ऊँचाई सैटेलाइट भू-भाग डेटा (SRTM) से हर 20 मी पर मापी गई है। यात्री 3D सैटेलाइट नक्शे पर उसी वास्तविक प्रोफ़ाइल पर चलता है। गति टॉबलर के हाइकिंग फ़ंक्शन से निकाली जाती है, जिसमें ऊँचाई, आपकी चाल और विश्राम का ध्यान रखा जाता है। हर कदम पर आप ऊँचाई, ढलान, ऑक्सीजन और तापमान देखते हैं, और अंत में मंदिर पहुँचने का समय।
गति
दिशा
3D भू-भाग · सैटेलाइट · कैमरा यात्री के साथ चलता है
ऋषिकेश → देवप्रयाग → रुद्रप्रयाग → गुप्तकाशी → सोनप्रयाग (लगभग 210 किमी)। निजी वाहन सोनप्रयाग तक ही जाते हैं; आख़िरी 5 किमी गौरीकुंड तक शेयर जीप चलती हैं।
केदारनाथ के रक्षक देवता; सर्दियों के लिए कपाट बंद होने से पहले इनकी पूजा होती है।
लगभग 1 किमी
गांधी सरोवर (चोराबाड़ी ताल)
चोराबाड़ी हिमनद के मुहाने पर हिमनदी झील।
लगभग 3 किमी
वासुकी ताल
4,135 मी पर ऊँची झील, जिसके आसपास ब्रह्मकमल के बुग्याल हैं (अगस्त–सितंबर)।
लगभग 8 किमी
त्रियुगीनारायण
जहाँ शिव-पार्वती का विवाह हुआ; अखंड अग्नि आज भी जल रही है।
सोनप्रयाग से लगभग 12 किमी
गौरीकुंड
पैदल यात्रा की शुरुआत में गर्म पानी का कुंड और गौरी माता मंदिर।
पैदल मार्ग का आधार
विश्रामकहाँ ठहरें
केदारनाथ के पास ठहरने के स्थान
केदारनाथ में GMVN की कुटियाएँ, BKTC की धर्मशालाएँ और टेंट कैंप; गुप्तकाशी, सीतापुर और सोनप्रयाग में हर तरह के होटल।
केदारनाथ
गुप्तकाशी · सीतापुर · सोनप्रयाग
GMVN पर्यटक विश्राम गृह
मध्यम श्रेणी के होटल
बजट लॉज
फाटा / सेरसी में हेलीपैड के पास होटल
अनुमानित / प्रति रात₹1,200 – ₹6,000+
केदारनाथ मार्ग पर सबसे ज़्यादा विकल्प और सबसे ज़्यादा सुविधा। मई–जून के लिए जल्दी बुक करें।
केदारनाथ
केदारनाथ
GMVN कुटिया और टेंट
BKTC धर्मशाला
स्विस-शैली के टेंट कैंप
अनुमानित / प्रति रात₹800 – ₹4,000
कमरे सीमित हैं और जल्दी भर जाते हैं। कमरे साधारण पर गर्म हैं। जून में भी रात को ठंड रहती है।
सुझावतीर्थयात्रियों के लिए सुझाव
यात्रा पंजीकरण अनिवार्य है — QR पर्ची और फ़ोटो पहचान पत्र साथ रखें।
चढ़ाई सुबह 6 बजे से पहले शुरू करें; ऊपरी मार्ग पर मौसम आम तौर पर दोपहर 1 बजे के बाद बिगड़ जाता है।
गौरीकुंड में सरकार द्वारा तय दरों पर घोड़े-खच्चर, पालकी और पिट्ठू मिलते हैं।
इस वेबसाइट का प्रबंधन
MushroomWale.com कार्यालय
पंच केदार यात्रियों के लिए एक निःशुल्क, स्वतंत्र मार्गदर्शिका, उत्तराखंड से तैयार की गई। मंदिरों की बुकिंग और दान केवल आधिकारिक माध्यमों से होते हैं — यह साइट कोई पैसा नहीं लेती।